NETAJI :Murder of a patriot by congress.
:- ulhas nikam
आज देश मे नेताजी की फाईले खुली होने के बाद भी मिडीया शांत है। अब क्यो किसी ने सवाल उठाया इस ढोंगी काँग्रेस पर? क्यो कोई नही पूछ रहा नेहरु और गांधी खानदान को जवाब? पुरा देश जान चुका है की नेताजी 1945 मे कोई प्लेन क्रॅश मे मारे नही गये थे। तब इन काँग्रेसीयोंको पता था फिर भी उन्होने पूरे देश को गुमराह करके रखा । सच कहूँ तो नेहरु ने नेताजी जैसे देशभक्त के साथ गद्दारी की। ग़द्दार थी काँग्रेस जो जानते हुये भी नेताजी को इंडीया मे वापिस ना लाई और मौत के मुँह मे छोड़ दिया।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद नेताजी को वॉर क्रिमिनल घोषित कर दिया गया तो उन्होंने एक फर्जी सूचना फ्लैश कराई कि प्लेन क्रैश में नेताजी की मौत हो गई। बाद में वह शरण लेने के लिए रूस पहुंचे, लेकिन वहां तानाशाह स्टालिन ने उन्हें कैद कर लिया। स्टालिन ने नेहरू को बताया कि नेताजी उनकी कैद में हैं क्या करें? इस पर नेहरु ने गद्दारी कर ब्रिटिश प्रधानमंत्री को इसकी सूचना भेज दी और कहा कि आपका वॉर क्रिमिनल रूस में है। साथ ही उन्होंने स्टालिन को इस पर सहमति दे दी कि नेताजी की हत्या कर दी जाए।'
उस वर्ष 1945 में ताइवान में कहीं भी कोई हवाई दुर्घटना न तो दर्ज है और न ही बोस का नाम मृतकों की सूची में शामिल है। जवाहरलाल नेहरू के तत्कालीन स्टनॉग्रफर श्यामलाल जैन मेरठ के ही थे। उन्होंने खोसला कमिशन के सामने अपने बयान में बताया था कि रूस के प्रधानमंत्री स्टालिन ने संदेश भेजा था कि 'सुभाष चंद्र बोस हमारे पास हैं, उनके साथ क्या करना है?' उन्होंने बताया था कि इस पत्र का जवाब प्रधानमंत्री नेहरू ने 26 अगस्त 1945 को आसिफ अली के घर बुलाकर उनसे ही लिखवाया था। हालांकि कमिशन ने इस पर विश्वास न कर उनसे सबूत मांगा था। (जाँच कमीशन भी तत्कालीन काँग्रेसीया सरकार का चमचा निकला।)
उस वर्ष 1945 में ताइवान में कहीं भी कोई हवाई दुर्घटना न तो दर्ज है और न ही बोस का नाम मृतकों की सूची में शामिल है। जवाहरलाल नेहरू के तत्कालीन स्टनॉग्रफर श्यामलाल जैन मेरठ के ही थे। उन्होंने खोसला कमिशन के सामने अपने बयान में बताया था कि रूस के प्रधानमंत्री स्टालिन ने संदेश भेजा था कि 'सुभाष चंद्र बोस हमारे पास हैं, उनके साथ क्या करना है?' उन्होंने बताया था कि इस पत्र का जवाब प्रधानमंत्री नेहरू ने 26 अगस्त 1945 को आसिफ अली के घर बुलाकर उनसे ही लिखवाया था। हालांकि कमिशन ने इस पर विश्वास न कर उनसे सबूत मांगा था। (जाँच कमीशन भी तत्कालीन काँग्रेसीया सरकार का चमचा निकला।)
नेहरू हमेशा रूस से दबे रहे और कभी कोई विरोध नहीं किया। नेहरु को पता था कि नेताजी की मौत के रहस्य से पर्दा उठेगा और सच सामने आएगा कि देश के गद्दार कौन थे। शायद नेहरु को डर था की नेताजी को वापिस लाया जाये तो पुरा देश उनको सर पे बीठायेगा। उस वक्त गांधी तो पन्नो पन्नो पे छपे थे पर नेताजी दिलो दिलो में बसे थे। नेताजी को वापिस लाया जाता तो यक़ीनन नेताजी स्वतंत्र भारत के पहले पंतप्रधान होते। शायद आज अपनी करंसी पे गांधी की नही नेताजी की तस्वीर होती। ये नेहरु ने होने नही दिया।
आज सबकुच जानते हुये भी सब चुप है। क्यो कोई कुच पुंछ नही रहा। तब काँग्रेस ने नेताजी के साथ गद्दारी की आज देश चुप रह के कर रहा है।
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